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प्रौढ़ साक्षरता पर पाओलो फ्रेरे के विचार

paulo-freire-quoteलिट्रेसी के क्षेत्र में काम करने वाले साथियों के लिए उपयोगी किताबों में एक नाम ‘प्रौढ़ साक्षरता’ का भी है। इस पुस्तक में साक्षरता को एक नए नज़रिए से देखने की कोशिश की गयी है। ताकि साक्षरता को व्यापक संदर्भ में देखा और समझा जा सके। इस किताब का हिंदी में अनुवाद जबरीमल्ल पारख ने किया है।

इस किताब की प्रस्तावना में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार लिखते हैं, “फ्रेरे का चिंतन और उससे उपजने वाले निर्देश लगातार हमसे यह मांग करते हैं कि हम कुछ भी करने से पहले समाज की छानबीन करें और विशेषकर उन ढांचों या संरचनाओं को पहचानें जिनके भीतर निरक्षरता एक अनिवार्य तार्किक परिणति के के रूप में व्याप्त रही है और आँकड़ों के स्तर पर घटते जाने के बावजूद वास्तव में फैलती और गहराती चली गई है।”

‘शिक्षा या तो पालतू बनाती है या मुक्त करती है’

इसके आमुख का एक अंश है जोआगो द विएगा काउटिन्हो ने लिखा है। वे लिखते हैं, “फ्रेरे अपने शिक्षाशास्त्र की दार्शनिक मान्यताओं में विषयांतर सिखाते हुए वर्णमाला सिखाने की अपनी पद्धति प्रस्तावित करते हैं।

उस दर्शन का प्रमुख सिद्धांत है कि मनुष्य अधिक योग्य है- अधिक यानी कि किसी भी प्रदत्त समय या स्थान में जो वह है। दूसरे शब्दों में जो कुछ प्रदत्त है. जो कुछ पूर्णतः नियत है, उससे ऊपर उठने की क्षमता को बार-बार प्रदर्शित करना मनुष्य होने की पहचान है।

मनुष्य की योग्यता उसके आचरण (प्रेक्सिस) में अभिव्यक्त होती है जो संसार को रूपांतरित भी करता है और व्यक्त भी करता है। मनुष्य का आचरण उसका कर्म भी है और उसकी भाषा भी। यह आचरण मनुष्य पर दोबारा असर डालता है और उसे ‘अतिनिर्धारित’ करता है।

शिक्षा या तो पालतू बनाती है या मुक्त  करती है। हालांकि आमतौर पर इसे अनुकूलन प्रक्रिया के रूप में ग्रहण किया गया है, लेकिन शिक्षा उतनी ही अननुकूलन का जरिया भी हो सकती है।

शिक्षा जानने की क्रिया है

शिक्षा जानने की क्रिया है न कि कंठस्थ करने की। किताब की भूमिका में इस बात से प्रस्थान के बाद फ्रेरे कहते हैं कि हर शैक्षिक व्यवहार में मनुष्य और जगत की एक अवधारणा अंतर्निहित होती है। अपनी पुस्तक में फ्रेरे हमारा ध्यान स्कूल की किताबों की तरफ आकर्षित करते हैं कि उनके शब्द कितने निर्जीव होते हैं।

उनमें एक तरह का पक्षपात होता है वे हमारे जीवन को अभिव्यक्त नहीं करते और उससे बहुत गहराई से जुड़े नहीं होते। उनका कहना है कि प्रौढ़ों को पढ़ाते समय ऐसे शब्दों को काम में लेना चाहिए जो उनके जीवन से गहराई से जुड़े हैं। ऐसे वाक्यों का उपयोग किया जाना चाहिए जो उनके साथ बातचीत से उपजे हों।

शिक्षा और रोजगार

यहां वे साक्षरता के ‘पोषणवादी’ दृष्टिकोण से सजग रहने की गुजारिश भी करते हैं। इसमें अक्षरों की भूख और शब्दों की प्यास जैसे विशेषणों से निरक्षरों को संबोधित करने वाले दृष्टिकोण को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसी अवधारणा मनुष्य को एक निष्क्रिय प्राणी मानती है, पढ़ना-लिखना सिखाने की प्रक्रिया की वस्तु है न कि उसका कर्ता।

वे ऐसे वाक्यों का भी जिक्र करते हैं जो निर्जीव से होते हैं। जैसे चिड़िया के पंख होते हैं, इवा ने अंगूर देखा, कुत्ता भौंकता है, जॉन पेड़ों की देखभाल करता है। यहां वे एक उदाहरण के माध्यम से बताते हैं कि कैसे एक उदाहरण को बाकी लोगों के लिए रोल मॉडल बनाकर पेश किया जाता है। जैसे पीटर मुस्कुरा रहा है क्योंकि वह पढ़ना जानता है। वह खुश है क्योंकि उसे नौकरी मिल गई है।

वे आगे लिखते हैं कि लोगों को महज पढ़ना-लिखना सिखाने से चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यदि लोगों के देने के लिए ज्यादा नौकरियां नहीं हैं, तो, उनको पढ़ना-लिखना सिखाने से वे पैदा नहीं हो जाएंगी।

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