अपनी परेशानी छिपाकर ऑनलाइन क्लास लेने को क्यों मजबूर हैं निजी स्कूलों के शिक्षक?

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चेतना मध्यप्रदेश की राजधानी में पिछले आठ साल से एक निजी स्कूल में अध्यापिका हैं। इसके पहले भी वे भोपाल के दूसरे निजी स्कूलों में अध्यापन के काम से जुड़ी रही हैं। एक दशक से ज्यादा के अपने कार्यकाल में चेतना ने कोरोना काल जैसा संकट इससे पहले नहीं झेला है। यह सच्ची कहानी कोरोना काल में हुए पहले लॉकडाउन के समय की है, जिसमें अकेले चेतना ही नहीं न जाने कितने ऐसे निजी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों की पीड़ा छिपी है, जो सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। वे बच्चों को ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं। इस काम के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। फिर भी बहुत सी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

चेतना मार्च के चौथे सप्ताह में में अपने घर पर लॉकडाउन के दौरान रोजमर्रा के काम निपटा रही थीं। अचानक उनके फोन पर एडमिन स्कूल कॉलिंग फ्लैश हो रहा था। आटे से सने हाथों को जल्दी से कपड़े से पोंछते हुए चेतना ने फोन उठाया ही था कि उधर से आवाज आई आपके पास लैपटॉप तो है न चेतना जी। चेतना ने कहा-जी हां। तो फिर एडमिन साहब बोले सुनिए आप अपने लैपटॉप और मोबाइल पर जूम ऐप डाउनलोड कर लीजिए और तेज स्पीड इंटरनेट की व्यवस्था दुरुस्त रखिए। एक अप्रैल से स्कूल ने ऑनलाइन क्लास शुरू करने का निर्णय लिया है। प्रबंधन की ओर से आपको भी ऑनलाइन क्लास लेने के लिए चुना गया है। चेतना किचन से निकलकर अपने लैपटॉप को निहार रही थी। आटा अधसना किचन के प्लेटफॉर्म पर रखा हुआ था।

‘ऑनलाइन क्लास तो लेनी पड़ेगी’

चेतना ने टीवी पर कोरोना के अपडेट ले रहे अपने पति से बोली कि सुनिए दो-चार रोज बाद से ऑनलाइन क्लास शुरू हो रही हैं। मुझे आपके लैपटॉप की जरूरत रहेगी। चेतना के पतिदेव ने तपाक से कहा कि क्या तुम ये 10 से 15 हजार रुपये की प्राइवेट टीचर की नौकरी में सिर खपाती रहती हो। इससे ज्यादा तो तुम खुद ट्यूशन से कमा सकती हो। कोविड-19 जैसी विपदा के समय भी तुम्हारे स्कूल वाले बच्चों को ऑनलाइन क्लास में उलझा रहे हैं। पहली बार तो बच्चों को घर पर अपने दादा-दादी और मां-बाप के साथ इतना ज्यादा समय बिताने को मिल रहा है। वो शायद स्कूल वालों से देखा नहीं गया। चेतना बोली आप क्यों नाहक इस पर बहस कर रहे हैं। अब जब स्कूल प्रबंधन ने फैसला ले ही लिया है, तो क्लास तो लेनी ही पड़ेगी।

चेतना अपने पति से इतनी बात करने के बाद फिर आटे को गूंथने में जुट गई थी। परिवार के लिए खाना बनाने के बाद उसे साफ-सफाई सहित घर के दूसरे काम भी निपटाने थे। कुछ रोज बाद घर की जिम्मेदारियों के बीच चेतना का ऑनलाइन क्लास लेने का सिलसिला शुरू हो चुका था। तमाम तकनीकी व्यवधानों और पहली बार ऑनलाइन क्लास के अनुभवों से गुजरते हुए चेतना धीरे-धीरे इसकी अभ्यस्त हो रही थी। हालांकि स्कूल में 40 से 45 मिनट की एक कक्षा ऑनलाइन में डेढ़ घण्टे तक की हो रही थी। आधा अप्रैल बीत चुका था और चेतना की मार्च की सैलरी एक दिन पहले ही सैलरी अकाउंट में क्रेडिट हुई थी। ऑनलाइन क्लास को लेकर शहर के दूसरे स्कूलों ने भी काम शुरू कर दिया था।

शहर के लगभग दो दर्जन से ज्यादा बड़े निजी स्कूल और इनमें पढ़ा रहे 200 से ज्यादा शिक्षक इसी उहापोह से गुजर रहे थे। इस बीच इन बड़े निजी स्कूलों में प्रतिस्पर्धा भी सी चल रही थी। पैरेंट्स के बीच स्कूल ऑनलाइन क्लास को लेकर ही प्रचार करने में जुटे थे, ताकि लॉकडाउन के बावजूद आने वाले शिक्षा-सत्र में ज्यादा से ज्यादा बच्चे जुटाए जा सकें। तमाम तरह की परेशानीयों को पार करते हुए चेतना अप्रैल में अपनी तय कक्षाएं पूरी कर चुकी थीं। मई की तेज धूप के साथ लॉकडाउन में कुछ-कुछ ढील के बीच उसे अपनी सैलरी का इंतजार था। लेकिन सैलरी अकाउंट में जब सैलरी क्रेडिट होने का मैसेज उसके मोबाइल पर आया तो उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

वेतन में कटौती मार

6212 रुपये का कुल भुगतान उसे किया गया था। स्कूल प्रबंधन के एचआर और एडमिन से जब उसने बात की तो चेतना को जवाब मिला कि स्थितियां अनुकूल नहीं हैं। सबकी वेतन में कटौती की गई है। फिर ऑनलाइन क्लास में तो काम भी कम रहता है। चेतना कुछ जवाब नहीं दे सकी थी, लेकिन उसे स्कूल के वर्क स्लोगन की टैगलाइन अब चुभ रही थी। जिसमें एक टीम, एक परिवार और हर विपदा में साथ खड़े होने की बात थी। चेतना अपनी तमाम चुुनौतियों के साथ अभी भी ऑनलाइन क्लास ले रही हैं। क्योंकि उसने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है, उसे लगता है कि स्थितियां सामान्य होने के बाद उसकी सैलरी और मुस्कान दोनों वापस लौटेंगी। इस समय ऐसी कई चेतना जैसी शिक्षिकाएं और शिक्षक हैं जो देशभर के निजी स्कूलों में अपनी पीड़ा छिपाकर चेहरे पर मुस्कान लिए बच्चों को ऑनलाइन पढ़ा रही हैं।

यह कोरोना काल में निजी स्कूलों की एक दुःखद तस्वीर है, जो छोटे शहरों में सबसे ज्यादा है। यह समस्या निजी स्कूल शिक्षकों की वेतनों में कटौती या नौकरी जाने तक नहीं है। यह शिक्षण संस्थाओं के प्रति शिक्षकों का भरोसा टूटने का दौर है, जिसका खामियाजा शिक्षण संस्थानों को निकट भविष्य में जरूर चुकाना होगा।

नोटः इस कहानी में नाम और स्थान बदल दिए गए हैं। चेतना की ”चेतना” का तो कोई न कोई तार मुझसे जुड़ा हुआ था, जो उनकी पीड़ा मुझ तक पहुंच सकी। इस कोरोना काल में देशभर के निजी स्कूलों के लाखों शिक्षकों की सैलरी कतर दी गई हैं। इतना ही नहीं स्पोर्ट्स, ड्रामा, डांस, म्यूजिक और अन्य एक्टिविटीज के टीचर्स अस्थायी तौर पर स्कूल मालिकान ने घर बिठा दिए हैं। सवाल यह है कि क्या कोरोना के पहले निजी स्कूलों ने पिछले कुछ सालों में इतना भी मुनाफा नहीं कमाया है कि शिक्षकों को इस कठिन समय में कुछ माह लगातार बिना कटौती के वेतन का भुगतान कर सकें? यह सवाल मेरे मन में अभी भी गूँज रहा है, आप भी सोचिए।

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(लेखक परिचयः दीपक गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं। आपने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म (एमजे) की पढ़ाई की है। आपने मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में एक दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर और लोकमत जैसे संस्थानों में सक्रिय पत्रकारिता की है। इसके साथ ही साथ जीवन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने ब्लॉग पर स्वतंत्र लेखन भी करते हैं।)

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1 Comment

  1. सटीक विश्लेषण सर
    जहाँ आम जनता पर कोरोना की गाज गिरी हैं ,वही शिक्षक भी नहीं बच पाए हैं ।

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