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‘सक्रिय आंगनवाड़ी’ बनाने वाली कार्यकर्ताओं के प्रोत्साहन में कंजूसी क्यों?

भारत में आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों के जीवन में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और पोषण की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में  एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन केंद्रों पर काम करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता (Anganwadi Workers) इस प्रणाली की रीढ़ मानी जाती हैं। इनका काम चुनौतीपूर्ण तो है ही, इसके साथ ही समाज के लिए उनके योगदान का योगदान अमूल्य है। इस लेख में हम आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रयासों को रेखांकित करेंगे और उनकी प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख करेंगे। ताकि पूर्व-प्राथमिक शिक्षा व पोषण के क्षेत्र में उनकी भूमिका और योगदान को विस्तार से समझ सकें।

आंगनबाड़ी केंद्रों का महत्व

वर्ष 1975 में एकीकृत बाल विकास योजना (ICDS) के तहत शुरू किए गए आंगनबाड़ी केंद्रों का मुख्य उद्देश्य बच्चों के समग्र विकास को सुनिश्चित करना था। इन केंद्रों पर दी जाने वाली सेवाएँ मुख्यतः छह क्षेत्रों पर केंद्रित होती हैं:

  1. पूर्व-प्राथमिक शिक्षा
  2. पोषण और स्वास्थ्य देखभाल
  3. स्वास्थ्य और पोषण शिक्षा
  4. प्रतिरक्षण सेवाएँ
  5. स्वास्थ्य जाँच
  6. रेफरल सेवाएँ

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और आंगनबाड़ी सहायिका दोनों मिलकर इन सभी सेवाओं को सामुदायिक स्तर पर पहुंचाने का काम करती हैं। इनकी सबसे प्रमुख भूमिका बच्चों की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की मजबूत बुनियाद तैयार करना है ताकि बच्चे स्कूल जाने से पहले की तैयारी कर सकें। वे अपने केंद्र पर बच्चों को एक भयमुक्त वातावरण में खेल-खेल में सीखने का अच्छा माहौल प्रदान करती हैं, जहाँ बच्चों का शारीरिक विकास होता है, बच्चे सामाजिक-भावनात्मक कौशलों का विकास करते, अपने शारीरिक विकास को भी खेलों के माध्यम से सुनिश्चित करते हैं और अपनी रचनात्मक क्षमताओं का भी विकास करते हैं।

आपको किसी आँगनबाड़ी केंद्र की प्रत्यक्ष रूप से विजिट करके बड़ी हैरानी हो सकती है कि इतने कम संसाधनों में भी व्यवस्थित तरीके से बच्चों के सीखने की परिस्थिति बनाई जा सकती है और समुदाय का भरोसा भी हासिल किया जा सकता है।

आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की प्रमुख जिम्मेदारियाँ

1.पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का मजबूत आधार तैयार करना: आँगनबाड़ी कार्यकर्ता अपने गाँव में तीन से छह वर्ष तक के बच्चों का नामांकन अपने केंद्र पर करती है। जो बच्चे 6 साल की उम्र पूरी कर लेते हैं, उनका नामांकन विद्यालय में हो और बच्चों की प्राथमिक शिक्षा जारी हो इसके लिए भी सहयोग करती है। इसके साथ-साथ बच्चों के बहु-आयामी विकास के लिए बनी योजनाओं व रणनीतियों का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन आँगनबाड़ी सहायिका के साथ मिलकर करती है। उनके काम में बच्चों का भाषायी विकास और संख्या-पूर्व अवधारणाएं भी संज्ञानात्मक विकास वाले डोमेने के रूप में शामिल हैं।

इसके साथ ही आंगनबाड़ी केंद्र पर पढ़ने वाले बच्चे खुशहाल हों और सभी बच्चों का सामाजिक-भावनात्मक विकास भी सुगमता के साथ हो, इसका भी वे बच्चों के विकास के संदर्भ में विशेष ध्यान रखती हैं। उनका काम बच्चों में सीखने की जिज्ञासा, तार्किक चिंतन और सृजनात्मकता का विकास करना भी है। वे बच्चों को कहानियों, कविताओं, और विभिन्न खेलों के माध्यम से भाषा और सामाजिक कौशल सिखाने का प्रयास करती हैं। इस विधा में वे जिस हाव-भाव व तल्लीनता के साथ काम करती हैं, वह निःसंदेहर सराहीय है।

इसके साथ ही, वे बच्चों को विभिन्न खेल गतिविधियों में भागीदारी के माध्यम से शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर बच्चों की मोटर स्किल्स (सूक्ष्म और स्थूल मांसपेशीयों के विकास) पर भी ध्यान देती हैं। बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार करना यानि ‘स्कूल रेडिनेस’ करना उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक है।

 

2.स्वास्थ्य और पोषण पर ध्यान देना: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए सामुदायिक स्तर पर जागरूकता के साथ उनके पोषण स्तर को सुनिश्चित करती हैं। वे बच्चों को पूरक पोषण कार्यक्रमों के माध्यम से केंद्र पर संतुलित आहार उपलब्ध कराती हैं। इसके साथ ही, वे गर्भवती और धात्री महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी जानकारी देकर जागरूक भी करती हैं। समुदाय में बच्चों के कुपोषण से संबधित विभिन्न मामलों की पहचान और उनके समाधान के लिए सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी है।

3.स्वास्थ्य सेवाओं में सहायता: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों के साथ मिलकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए टीकाकरण अभियान चलाने में मदद करती हैं। वे नियमित स्वास्थ्य जाँच कार्यक्रमों का संचालन करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर मरीजों को रेफरल सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं। सप्ताह में एक दिन का समय आँगनबाड़ी केंद्रों पर टीकाकरण के लिए तय होता है।

4.समुदाय से संपर्क और जागरूकता: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता माता-पिता और समुदाय के अन्य सदस्यों के साथ बातचीत करती हैं। वे बच्चों की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के लिए होम विजिट्स और और बैठकें आयोजित करती हैं। उनका मुख्य उद्देश्य परिवारों को बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और समग्र विकास के प्रति जागरूक बनाना है।

5.सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को विभिन्न सरकारी योजनाओं, जैसे पोषण अभियान, और मातृत्व लाभ योजनाओं को लागू करने का काम भी करना होता है। वे इन योजनाओं को प्रभावी रूप से समुदाय तक पहुँचाने में एक पुल का काम करती हैं।

6.डेटा संग्रह और रिकॉर्ड प्रबंधन: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता 0 से 3 वर्ष और 3 से 6 वर्ष के बच्चों और गर्भवती महिलाओं से संबंधित आंकड़े एकत्र करती हैं। ये आँकड़े महिलाओं और बच्चों के विकास के संबंधित विभिन्न योजनाओं की निगरानी और बेहतरी के लिए उपयोग किए जाते हैं। वे नियमित रूप से आँगनबाड़ी के खुलने की सूचना, बच्चों की उपस्थिति, उनकी पोषण स्थिति, और स्वास्थ्य जाँच का रिकॉर्ड रखती हैं। वर्तमान समय में बहुत सी जानकारियां ऑनलाइन ऐप के माध्यम से अपडेट करने का काम भी आँगनबाड़ी कार्यकर्ता कर रही है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP-2020) और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस नीति के अनुसार, प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा एवं देखभाल (ECCE) बच्चों के समग्र विकास के लिए एक बुनियादी जरूरत है। इसमें 3-6 वर्ष के बच्चों की शिक्षा को औपचारिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने की योजना है। तीन वर्ष से पहले की शिक्षा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 हो बेस्ड शिक्षा के अंतर्गत स्वीकार करती है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ECCE के तहत निम्न जिम्मेदारियों को निभा रही है –  

NCF-FS (फाउंडेशन स्टेज) के साथ तालमेल: एनसीईआरटी द्वारा विकसित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के फाउंडेशन स्टेज में आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बच्चों के बहुआयामी-विकास के लिए खेल, खोज और गतिविधि आधारित शिक्षण कराने की अपेक्षा की गई है। इसके साथ ही साथ बच्चों के साथ काम करते समय बच्चों के घर की भाषा का उपयोग करना, कहानियों व कविताओं का इस्तेमाल बच्चों के भाषायी विकास के लिए करना, बच्चों के शारीरिक विकास को प्रोत्साहित करना और उनके संज्ञानात्मक विकास को प्रेरित करने वाला माहौल प्रदान करना है। अंततः इसका उद्देश्य बच्चों को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की बुनियादी को मज़बूत करना है।

इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जिन बच्चों को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा हासिल करने का मौका मिलता है, उन बच्चों के बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान में भी बेहतर करने की संभावनाएं प्राथमिक स्तर पर बढ़ जाती है। इसलिए पूर्व-प्राथमिक शिक्षा में निवेश को बच्चों के विकास की दृष्टि से एक बेहतर सामाजिक निवेश के रूप में देखा जाता है। यहाँ एक ग़ौर करने वाली बात है कि जिस स्केल पर आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को सपोर्ट करते हैं, वह दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं में से एक है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की प्रमुख चुनौतियां

कुछ बातें हम केवल खबरों में सुनते हैं जैसे पिछले कई महीनों से आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वेतन नहीं मिला। वेतन में बढ़ोत्तरी की खबरें भी आती हैं। वेतन में बढ़ोत्तरी की माँग को लेकर होने वाले पर्दर्शन का भी जिक्र भी खबरों में आता है। इसके अलावा आंगनवाड़ी केंद्र में नियुक्ति के लिए पात्रता वाली खबरें भी सुर्खियों में आती है। लेकिन इन खबरों के पर भी बहुत सारी बातें हैं जिनका जिक्र आमतौर पर नहीं होता, उनकी तरफ हम आपका ध्यान दिलाना चाहते हैं। ताकि आप आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की वास्तविक स्थितियों को समझ सकें और अगली बार किसी आंगनवाड़ी केंद्र में काम करने वाले कार्यकर्ता और सहायिका से मिलें तो आपके मन में सम्मान और समानुभूति का भाव हो। 

 उदाहरण के तौर पर शहरी क्षेत्र में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में काम करने वाले कार्यकर्ताओं की चुनौतियाँ जगह की कमी, बच्चों के लिए खेलने की खुली जगह की कमी और विभिन्न संसाधनों को रखने के लिए चुनौती के रूप में सामने आ सकती हैं। शहरी क्षेत्रों में किराए पर चलने वाली आंगनबाड़ी केंद्रों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं होतीहैं, इसी तरह की स्थिति गाँव में किराए पर चलने वाले आंगनबाड़ी केंद्रों की होती है। एक ही कमरे में पोषण की सामग्री, कुकिंग का सामना और बच्चों के खेलने के सामान इत्यादि रखे होते हैं। कई आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों के विकास के लिए बनने वाले चार कॉर्नर बनाने की जगह नहीं होती है।

टेक्निकल डोमेन में सहयोग के लिए क्षमतावर्धन की जरूरत

पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्र काफी टेक्निकल है और इसमें काम करने वाली कार्यकर्ताओं की पढ़ाई 12वीं से लेकर बी.ए. और अब एम. ए. और बी.एड. तक भी जा रही है। लेकिन इसमें काफी अंतर है। इस स्थिति को देखते हुए इनके क्षमतावर्धन को लेकर सतत प्रयास करने की जरूरत है। इन प्रयासों का कुछ हिस्सा बड़े समूह में प्रशिक्षण के रूप में होना चाहिए, इसके बाद छोटे-छोटे समूह में क्षमतावर्धन की स्थानीय जरूरतों को पूरा करने पर केंद्रित होना चाहिए और इसके साथ नियमित अंतराल पर मिलने वाले ऑन साइट सपोर्ट आंगनबाड़ी केंद्रों को फंक्शनल और सक्रिय बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

यह डोमेने टेक्निकल है, इसलिए प्रशिक्षण की सामग्री का यूजर फ्रेंडली यानि उपयोग के लिए सुगम होना जरूरी है और यह सुगमता कठिन अवधारणाओं को सहज भाषा में, चित्रात्मक तरीके से और सटीक उदाहरणों के साथ और आयु-उपयुक्त रणनीतियों के अनुरूप होना बेहद जरूरी है। ताकि आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को काम करने के लिए एक ऐसा उदाहरण मिल सके जिसे वे अपनी कक्षाओं में सीधे-सीधे लागू कर सकें। इस प्रक्रिया में सैद्धांतिक समझ को भी आसान भाषा में स्थानीय उदाहरणों के माध्यम से समझाने और क्या समझ बन रही है यह जानने की कोशिश वास्तव में बदलाव की राह को आसान बनाती है। 

‘स्कूलों को तो सहयोग मिलता है, लेकिन आंगनवाड़ी केंद्रों को नहीं’

कुछ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने बातचीत में बताया कि समुदाय या गाँव के लोग विद्यालय को आर्थिक सहयोग को उदारता के साथ देते हैं, लेकिन आंगनबाड़ी केंद्रों को सहयोग करने के लिए सुगमता से आगे नहीं आते हैं। कई आंगनबाड़ी केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी होती है, जैसे पर्याप्त कमरों का अभाव, शौचालय के साफ-सफाई व स्वच्छता की बेहतर स्थिति न होना भी उनमें से एक है। कई बार बरसात के दिनों में कमरे की दीवारों में सीलन आ जाती है, कई जगहों पर आंगनबाड़ी केंद्र के रास्ते में पानी भर जाता है और बच्चों का केंद्र पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। संक्षेप में कहें तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता चूंकि उसी समुदाय से आती हैं जहाँ पर केंद्र का संचालन हो रहा है इसलिए वे स्थितियों से बहुत अच्छी तरह वाकिफ होती हैं।

आंगनबाड़ी केंद्रों में एक बड़ी चुनौती 3 से 6 वर्ष तक वाले समुदाय के अधिकांश बच्चों का नामांकन और नियमितता की भी है, क्योंकि गाँव के लोग आँगनबाड़ी केंद्रों को पढ़ाई वाले स्थान के रूप में देखने का नजरिया नहीं विकसित कर पाएं हैं। गाँव में संचालित होने वाले निजी स्कूलों में छोटे बच्चों का नामांकन प्री-प्राइमरी कक्षाओं में होने के कारण व बच्चे अपने बड़ी भाई-बहनों के साथ निजी स्कूल में चले जाते हैं। इसके कारण कुछ गाँव जहाँ पर निजीकरण का ज्यादा प्रभाव है, आँगनबाड़ी केंद्र 0 से 3 वर्ष के बच्चों और धात्री महिलाओं की जरूरतों को प्रमुखता से पूरा करने का काम तो कर रहे हैं, लेकिन पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के बेहद जरूरी माने जाने वाले काम में अपना महत्वपूर्ण योगदान नहीं कर पा रहे हैं।

आखिर में हम कह सकते हैं कि गाँव में आज भी लोग एक पुराने नजरिए से ही आँगनबाड़ी केंद्रों को देखते हैं। वे सोचते हैं कि यहाँ पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चों और महिलाएं को पोषण का आहार देने के लिए ही काम करती हैं। इसके आलावा उनके काम को हम कोई अपने-अपने नजरिये से समझने की कोशिश करता है। ऐसी सोच के कारण भी उनको विभिन्न चुनौतियों का सामना करना होता है, जो उनके मोटीवेशन या प्रेरणा के स्तर को प्रभावित करती हैं। लेकिन यह उनकी जिजीविषा और बेहतर करने की इच्छाशक्ति ही है कि इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी वे अपनी परेशानियों को बच्चों के साथ होने वाले शिक्षण के काम पर हावी नहीं होने देतीं।

अगर एक पंक्ति में कहें तो आंगनवाड़ी केंद्र को सक्रिय बनाकर पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने जो योगदान दिया है उसे स्थानीय या बड़े स्तर पर वह प्रोत्साहन व पहचान नहीं मिला है, जिसकी वे वास्तविक हकदार हैं।  

(आप एजुकेशन मिरर को फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब पर फ़ॉलो कर सकते हैं। एजुकेशन मिरर के लिए अपने लेख भेजें educationmirrors@gmail.com पर।)

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