पेट में छुपी कहानियाँ: भीतर की आवाज़ को बाहर लाने वाली एक सुंदर चित्रकथा

एकलव्य भोपाल से कुछ समय पहले एक किताब प्रकाशित हुई है। पेट में छुपी कहानियाँ नाम की यह किताब एक खूबसूरत और विचारोत्तेजक चित्रकथा है। इस किताब की लेखक और चित्रकार रोशनी व्याम हैं। इसकी कहानी गोंड परधान जनजाति की एक लोककथा पर आधारित है। यह सिर्फ दो मित्रों की कहानी नहीं है, बल्कि कहानियों के महत्व, उन्हें साझा करने की ताकत और हमारे भीतर छुपी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जरूरत को बेहद सहज ढंग से सामने लाती है।
कहानी के दो प्रमुख पात्र लच्छू और हीरू हैं, जो बहुत अच्छे मित्र हैं। हीरू को कहानियाँ सुनना और सुनाना बहुत पसंद है, जबकि लच्छू किसी भी कहानी को अपने भीतर ही दबाकर रखता है। अपनी कहानियों और भावनाओं को भीतर छुपाकर रखने के कारण लच्छू को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लच्छू के अन्दर छुपी कहानियाँ बाहर आना चाहती हैं। पर वो उन्हें बाहर नहीं लाना चाहता। यही से उसकी परेशानी शुरु हो जाती है। जो बाहर नहीं आ पा रही हैं वे कहानियाँ अन्दर ही अन्दर घुटन महसूस करती हैं। दूसरी ओर, हीरू अपनी कहानियों के माध्यम से न केवल स्वयं को समृद्ध करता है बल्कि अपने मित्र लच्छू को भी आने वाली मुश्किलों से बचाने में मदद भी करता है। इस सरल से कथानक के माध्यम से कहानी हमारे भीतर जो भी विचार, भावनाएँ और अनुभव हैं, उन्हें व्यक्त करने के महत्व को स्थापित करती है।
इस किताब का चित्रांकन क्यों है ख़ास?
इस किताब की एक खास बात है इसके चित्र हैं। इन्हें रोशनी व्याम ने गोंड परधान चित्रकला शैली में बनाया है। कहानी जिस सांस्कृतिक परिवेश से निकलकर आती है, चित्र भी उसी परंपरा और संवेदना को आगे बढ़ाते हैं। शब्द और चित्र का यह सुंदर मेल इस पुस्तक को खास बनाता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि यह कहानी एक ऐसे समुदाय की मौखिक परंपरा और गैर-प्रमुख भाषा संसार से आती है, जिसकी उपस्थिति मुख्यधारा के साहित्य और समाज में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।

गोंड परधान चित्रकला ने पिछले कुछ वर्षों में देश और दुनिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। इस कला को व्यापक पहचान दिलाने में प्रसिद्ध कलाकार जनगढ़ सिहं श्याम का खासा योगदान रहा है। दुर्गाबाई व्याम जैसे कलाकारों ने इस कला को और स्थापित किया है। और रोशनी व्याम के चित्र भी उसी परंपरा की निरंतरता को आगे बढ़ाते हैं और बच्चों को एक अलग संसार से परिचित कराते हैं।
आज का समय बच्चों के लिए अनेक प्रकार की चुनौतियाँ लेकर आया है। प्रतियोगिता, परीक्षा और अंकों की दौड़ ने बच्चों के जीवन में दबाव और तनाव को बढ़ाया है। कई बार बच्चे अपनी चिंताओं, डर और उलझनों को किसी से साझा नहीं कर पाते और वे बातें उनके भीतर ही जमा होती रहती हैं।
ऐसे समय में पेट में छुपी कहानियाँ’ जैसी किताबें बच्चों को एक महत्वपूर्ण मौका देती हैं। वो हमें आगाह करती हैं कि अपने भीतर की बातों को व्यक्त करना कितना जरूरी है। यह जरूरी नहीं कि हर समस्या का समाधान तुरंत मिल जाए, लेकिन अपनी भावनाओं को बाहर लाने से मन हल्का होता है और व्यक्ति स्वयं को नए नजरिए से समझ पाता है। ऐसी किताबें बच्चों को केवल पढ़ने का आनंद नहीं देतीं, बल्कि उन्हें सोचने, सवाल करने और अपनी भावनाओं को पहचानने का अवसर भी प्रदान करती हैं।
इन्हीं कारणों से यह जरूरी है कि इस तरह की किताबों की पहुँच अधिक से अधिक बच्चों तक हो।
किताब का नाम: पेट में छुपी कहानियाँ
लेखक चित्रकार: रोशनी व्याम
प्रकाशक: एकलव्य, भोपाल
मूल्य: 70 रुपए
आईएसबीएन: 9789348176431
(लेखक परिचय: शिवनारायण गौर एक स्वतंत्र लेखक हैं। पिछले दो दशकों से अधिक समय से शिक्षा और प्रकाशन के क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था एकलव्य फाउंडेशन के साथ जुड़े हुए हैं। कहानी सुनना-सुनाना, पढ़ना और लिखना उनकी प्रमुख रुचियाँ हैं। लाइब्रेरी, भाषा और रीडिंग के क्षेत्र में रिसोर्स पर्सन के रूप में भी सक्रिय हैं। उनकी रचनाएँ विभिन्न समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी किताब ‘बारह सौ की बाटी और अन्य किस्से’ को रूम टू रीड इंडिया चिल्ड्रन्स बुक ऑफ़ द ईयर 2025 का सम्मान प्राप्त हुआ है।)
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