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टॉपिकः पत्र लेखन के माध्यम से कैसे करें लेखन कौशल का विकास?

इस लेख में डॉ. केवलानन्द काण्डपाल बता रहे हैं कि पत्र विधा का इस्तेमाल लेखन कौशल के विकास के लिए किया जा सकता है। इस काम में बच्चों के अनुभवों, विचारों को सहज अभिव्यक्ति मिलती है।

पत्र लेखन की गतिविधि

पत्र लेखन की गतिविधि में शामिल होते बच्चे।

प्रस्तावना: कभी-कभी शिक्षकों और अभिभावकों की बातचीत में सुनने में आता है कि उनके बच्चे लिख तो लेते हैं मगर बोल नहीं पाते, पढ़ नहीं पाते, पढ़ तो लेते हैं पर लिख नहीं पाते। बोलना, पढना और लिखना अलग अलग समय पर घटित होने वाले भाषायी कौशल नहीं हैं बल्कि कमोवेश एक दूसरे के साथ-साथ चलने वाली भाषायी प्रक्रियाएं हैं। यह रिले रेस जैसा मामला नहीं है कि पहला धावक अपनी दौड़ पूरी करेगा तभी दूसरा दौड़ शुरू करेगा।

सुनने के साथ-साथ कुछ वर्षों में ही बच्चा बोलना शुरू कर देता है, बोलने के साथ कुछ समय पर पढना और पढने के साथ साथ कुछ समय बाद लिखना। इतना जरूर है कि बच्चे के पढ़ने एवं लिखने के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत होती है। यदि ये प्रयास बच्चे की जरूरतों के अनुसार, उसके परिवेशीय सन्दर्भ को ध्यान में रखकर सम्यक शिक्षण-शास्त्रीय आधार पर किये जाएँ तो यह उतना दुष्कर भी नहीं है जैसा कि प्रायः मान लिया जाता है। जिस प्रकार से अन्य कौशल करके ही सीखे जा सकते हैं, उसी प्रकार लिखना भी लिखकर ही आएगा, इसके अलवा कोई अन्य रास्ता भी नहीं है।

कार्यक्षेत्र की पृष्ठभूमि और हस्तक्षेप

मुझे, अक्तूबर 2017 में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पुड्कुनी में प्रधानाचार्य का कार्य-दायित्व मिला। यह विद्यालय जनपद बागेश्वर के कपकोट विकास खंड में अति दुर्गम क्षेत्र में अवस्थित है। यहाँ के बच्चे जिस परिवेश से आते हैं, वहां खेती-किसानी और पशुपालन आजीविका सम्बन्धी मुख्य गतिविधियाँ हैं।

बच्चों की घर की भाषा कुमायूनी है, जिसको एक विशेष उतार- चढाव से बोला जाता है (मैं स्वयं कुमायूनी भाषा बोलता समझता हूँ परन्तु मुझे भी इस उतार- चढाव को समझने में कुछ वक़्त लगा) । इस प्रकार से विद्यालय की भाषा हिंदी एक तरह से बच्चों के लिए दूसरी भाषा की तरह है। विद्यालय में मेरे कार्यभार ग्रहण करने के 4 माह के अंदर विद्यालय के भाषा अध्यापक का स्थानांतरण अपने गृह जनपद में हो गया।

इसलिए विद्यालय में भाषा के नए अध्यापक आने तक बच्चों का भाषा विषय में शिक्षण कार्य जारी रखने की चुनौती सामने थी। विद्यालय के अध्यापकों से विचार विमर्श करने के पश्चात सभी ने एक-एक कक्षा में भाषा पढ़ाने की जिम्मेदारी ले ली, मुझे कक्षा 6 मिली। दरअसल सभी ने अपने अपने लिए कक्षाएं चुन ली तो मेरे लिए यही कक्षा बची रह गयी। बाद में पता चला कि इस कक्षा के बारे में अन्य अध्यापकों का विचार था कि इन बच्चों को तो पढना-लिखना आता नहीं। खैर, शुरूआती कुछ महिनों में बच्चों में पढने के प्रति रूचि पैदा करने के लिए प्रयास किया, उनके परिवेश की किस्से कहानियों को उनसे सुनकर लिखा, बाद में उनके लिए पढ़ा, कुछ समय बाद बच्चे स्वतंत्र रूप से भी पढने लगे। इसके बाद चकमक पढ़ी गयी, बच्चे पढने लगे। इसी बीच बच्चों ने विषय की किताबों में भी रूचि लेना शुरू कर दिया।

letter-2यह सब चल ही रहा था इसी बीच लिखने की शुरुआत करना भी जरूरी था। बच्चों से जब भी लिखने की बात चलती तो बच्चे भाषा विषय की किताब लेकर हाज़िर हो जाते और पूछते कि हमें बता दो कहाँ से कहाँ तक लिखना है। संभव है लिखने के बारे में बच्चों के पूर्व अनुभव कुछ इसी तरह के रहे हों। मुझे भाषा के ‘लिखने के कौशल’ के सन्दर्भ में इसमें कुछ दिक्कत नज़र आयी। यह तो ठीक वैसे ही हुआ, जिस तरह से बच्चा किसी रटे हुए वाक्यों को बोल दे, किताब के किसी अंश को स्मृति के आधार पर पढ़ दे जबकि इन सबका उस बच्चे के लिए कोई अर्थ ही न हो। पुस्तक से किसी अंश को हूबहू अपनी कापी में उतार देना, सही अर्थों में लिखना नहीं है।

यह तो एक तरह से लिखने की प्रक्रिया में एक तरह से रटने का ही लिखित रूप हुआ। सही अर्थों में लिखना तो तब होता है जब बच्चा अपने मन में भली भांति विचार कर ले कि क्या लिखने जा रहा है ? क्यों लिखने जा रहा है ? मेरे लिखे को हुए जब दूसरा व्यक्ति पढ़ेगा तो क्या मतलब निकालेगा ? क्या-क्या लिखना जरूरी है ? और लिखने की जरुरत आंखिर क्यों है ? इन सभी के उत्तर में यह बात लिखने वाले की यह समझ में आ जाती है कि लिखने में समझने का तत्व महत्वपूर्ण है। वस्तुतः लिखना समझने के साथ लिखना ही तो है।

लिखने की शुरूआत कैसे करें?

कुछ दिन इसी उधेड़बुन में रहा कि लिखने की सही अर्थों में शुरुआत कैसे की जाए। कई विकल्प मन में उभरे परन्तु अंतर्मन स्वीकारने को तैयार नहीं था, फिर एक दिन मन में आया कि क्यों न पत्र लेखन विधा का इस्तेमाल किया जाए। संयोग से इस कक्षा में केवल 08 ही बच्चे थे, सो यह विचार जम गया।

इस हस्तक्षेप को किस प्रकार से कक्षा में क्रियान्वित किया जाए, इसकी मोटा-माटी एक रूप रेखा बनायीं और कक्षा के बच्चों से इस बारे में बातचीत की, बच्चों ने तय किया कि वे भी पत्र के द्वारा मुझसे कुछ पूछना/जानना चाहेंगे, यही तो मैं चाहता था कि बच्चे अपने सवालों को लिखकर प्रस्तुत करना सीखें,  और इस तरह से पत्र लिखने का सिलसिला शुरू हुआ। मेरा कक्ष (प्रधानाचार्य कक्ष) पोस्ट ऑफिस बन गया। कक्ष में दफ्ती के एक डिब्बे में मैंने पत्र रख दिए। यह पहले से ही तय कर दिया गया था कि कक्षा का अलग-अलग बच्चा अलग-अलग दिन पोस्ट मैन की भूमिका निभाएगा। पोस्ट मैन डिब्बे से पत्र ले जाएगा और बच्चों में बाँट देगा।

इसी प्रकार से बच्चों के पत्र इस डिब्बे में रख लेगा, जिनको में प्राप्त कर लूँगा। पहला पत्र मैंने ही बच्चों को अलग-अलग लिखा। इस पत्र में बच्चों के स्तर के अनुरूप में उनके परिवेश के बारे में बातें जानने की अपनी इच्छा लिखी। इन पत्रों का जवाब आने में कुछ दिन लगे। इधर मेरी बेचैनी बढती जा रही थी। फिर मेरे पत्रों के जवाब आने शुरू हुए, बहुत ही रोचक जवाब और उससे भी रोचक सवाल। बच्चे मेरे बारे में जानना चाहते थे। उनके सवाल थे मसलन-आप कहाँ पढ़े ? आपको कौन से विषय अच्छे लगते थे ? आपको गुरु जी से डर तो नहीं लगता था ? आदि-आदि।

मैंने हरेक पत्र को तसल्ली से पढने के बाद जवाब दिया, साथ ही इस बार कुछ और प्रश्न अपने पत्र में लिखे। पत्र लेखन में हिज्जों की गलतियों  की अनदेखी की। अगले पत्र में बस इतना ही किया कि जिस शब्द के हिज्जे बच्चे न गलत लिखे थे, उन शब्दों को किन्हीं दूसरे सन्दर्भ में मैंने अपने पत्र में लिखने का प्रयास किया। मेरा मानना था कि ऐसा करने से बच्चे के संज्ञान में आ जाएगा कि शब्द का सही हिज्जा क्या है ? यदि नहीं भी आया तो भी कोई बात नहीं।

पत्रों के उत्तर की अगली खेप बहुत जल्दी आ गयी। इस बार के पत्र पहले पत्र की तुलना में अधिक स्पष्ट और विस्तार में थे। सबसे बड़ी बात बच्चे अपनी बात लिखकर व्यक्त कर पा रहे थे। मैंने पत्र में लेखन या व्याकरण की कोई गलती इंगित नहीं की थी, मेरा विश्वास है कि इससे बच्चों को यह विश्वास हो गया था, उनके लिखे हुए की हंसी नहीं उड़ाई जायेगी और मैं भी, पत्र में उनकी लिखी हुई बात को ठीक-ठीक समझ पा रहा हूँ। यह विश्वास बच्चों में लिखने की अभिरुचि एवं विश्वास को बढाने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था।

पत्र लेखन के परिणाम

यह सिलसिला तकरीबन दो माह तक चला। इस बीच पत्र व्यवहार के 7 दौर चले। इसके साथ-साथ भाषा विषय की पाठ्य पुस्तक से भी कक्षा-कक्ष में बातचीत चल ही रही थी। पहले बच्चे पाठ के किसी प्रश्न के लिए यह जानने पर जोर देते थे कि इसका उत्तर पाठ के किस हिस्से में है ? इन दो महीने के बाद यह अंतर पड़ा कि बच्चे इस बात पर जोर देना कम कर दिया और उनके उत्तर किताबी नहीं होते थे। यदि कोई बच्चा किसी प्रश्न का उत्तर पाठ से हूबहू लिखता तो मैं पत्र में उसी प्रश्न को कुछ इस तरह से पूछता कि बच्चे का अपना उत्तर आ जाता था।

उदाहरण के लिए किताब में प्रश्न था कि रबी की फसल में कौन-कौन से अनाज पैदा होते हैं ? इसी प्रश्न को में पत्र में पूछ लेता कि जाड़ों के मौसम में आपके यहाँ कौन-कौन से अनाज खेतों में बोये जाते हैं, जिनको जाड़ों के बाद गर्मियां शुरू होने से पहले काटा जाता है ? इस पर बच्चे का उत्तर किताबी न होकर अपना होता था, जबकि वह रबी की फसल के बारे में ही बता रहा होता था। यदि एक बार बच्चा इसे समझ ले तो फिर उसे रटने की जरुरत नहीं है और परीक्षा में पूछे जाने पर बच्चा अपनी समझ से बहुत आसानी से इसका उत्तर लिख सकता है।

पत्र लेखन, भाषा विकास

बच्चों ने पत्र लेखन की गतिविधि में बड़ी सक्रियता से सहभाग किया।

पत्रों का सिलसिला अब कुछ कम हुआ है परन्तु अब बच्चे अपनी शिकायतों को लिखकर लाने लगे हैं। ऐसे ही एक बार अपने कक्षा मॉनिटर को बदलने के लिए बच्चों के अलग-अलग पत्र आये, जिसमें हरेक बच्चे ने मॉनिटर को बदलने के लिए अपने-अपने कारण दिए थे। अब बच्चे अपने विचारों को बताने के लिए आपस में भी पत्र लिखने लगे हैं। पत्र लेखन उनके लिए आनंददायक कार्य हो गया है। प्रकारांतर से बच्चों में लिखने की अभिरूचि बढ़ी है, ऐसा अनुमान किया जा सकता है।

निष्कर्ष

इस अनुभव के आलोक में, में कह सकता हूँ कि लिखना बच्चों के लिए आनंददायक प्रक्रिया बनती जा रही है। अब बच्चे क्या लिखना है ? यह पूछने के लिए मेरे पास भाषा की किताब नहीं लाते। अब तो बच्चे छोटी छोटी कवितायेँ या कहानी भी लिखने लगे हैं। यकीनन, ये कवितायें अनगढ़ सी प्रतीत हो सकती हैं, कहानियां बेतुकी लग सकती हैं परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों को लिखने में आनन्द आने लगा है। धीरे-धीरे इनमें परिष्कार होगा, निखर आएगा। ये वही बच्चे हैं जिनके बारे में यह माना जाता था कि इनको लिखना सिखाना संभव नहीं है और यह इन बच्चों ने केवल तीन माह में कर दिखाया।

जरुरत है तो सिर्फ, बच्चों की क्षमताओं में विश्वास करने की और उपयुक्त सन्दर्भों का उपयोग करके उनमें निहित क्षमताओं को शैक्षिक लक्ष्यों के परिप्रेक्ष्य में उचित दिशा देने की।

(एजुकेशन मिरर का यह लेख पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया। लिखिए अपनी राय कमेंट बॉक्स में अपने नाम के साथ। शिक्षा से जुड़े लेख साझा करें educationmirrors@gmail.com पर। हम उनको एजुकेशन मिरर पर प्रकाशित करेंगे ताकि अन्य शिक्षक साथी भी इससे लाभान्वित हो सकें।)

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Jai Shekhar

लिखना क्या होता है? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है और यह विवेचना बहुत कुछ बता पाने में सफल है।
पत्र लेखन विधा का ऐसा रुचिकर प्रयोग वास्तव में प्रशंसनीय है, और सहजता से ग्राह्य है।
अध्यापक ही जानता है कि बच्चे की क्या आवश्यकता है और उसे क्या कैसे सिखाया जा सकता है। इस प्रयोगशाला का वह ही ऐसा वैज्ञानिक है जो अचूक प्रयोग करता है और बहुतों के लिए वह परिणाम उपलब्ध करा देता है।

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