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‘साइंस Vs सोशल साइंसः दुनिया में ज्ञान खोजिए, ज्ञान को बाइनरी में मत झोंकिए’-जे. सुशील

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जे. सुशील लिखते हैं, “किसी ने कहा कि सोशल साइंस पढ़ाना चाहिए। साइंस पढ़ कर लोग रोबोट हो रहे हैं। मुझे लगता है कि ऐसी बात नहीं है। इस तरह की सोच छोटी है। असल में मसला ये है कि हम लोग थोड़ा-थोड़ा पढ़ कर चीज़ों को समग्रता में नहीं देख रहे हैं। हमने साइंस को देखा कि इससे नौकरी मिलेगी और सोशल साइंस पढ़कर राजनीति बतियाएगा बच्चा। ये गलत और घटिया अवधारणा है। पिछले दस साल में जोर रहा एमबीए औऱ इंजीनियरिंग का तो लाखों बच्चों ने ये काम कर लिया। हुआ कुछ नहीं। कारपोरेट के गुलाम होकर रह गए हैं सब।” लेख का बाकी हिस्सा उन्हीं के शब्दों में विस्तार से पढ़िए।

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सोशल साइंस। इसमें सोशल और साइंस अलग नहीं है। सब एक ही में समाहित है। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं। नैचुरल साइंस और सोशल साइंस। पहले ये सब अलग अलग नहीं थे। लियोनार्डो द विंची क्या थे। वैज्ञानिक थे, आर्टिस्ट थे, फिलॉसफर थे। क्या थे। लोग कहते हैं आर्टिस्ट थे। मैं कहता हूं वो इंजीनियर था डॉक्टर था। क्योंकि उस आदमी ने आज से चार सौ साल पहले हेलीकॉप्टर और पनडुब्बी का डिजाइन बना दिया था अपने नोटबुक में जिसे दसेक साल पहले लोगों ने जांचा तो पाया गया कि बिल्कुल परफेक्ट है। इस बारे में यूट्यूब में विंची के नाम से बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री देख लीजिए। मैं झूठ नहीं बोल रहा।

विंची लाशों को खोल खोलकर देखता था कि मांसपेशियां कैसे बनी होती हैं। उन्होंने आंखों की पूरी मेडिकल तस्वीर बना दी थी जब जब पोस्टमार्टम नाम की कोई चीज़ नहीं होती है। वो लाशों को खोल खोल कर चेक करते कि मानव शरीर की रचना कैसी है तभी वो वेट्रूवियस मैन बना पाए। अब ये मत पूछिएगा। उस पर अलग से पोस्ट लिखना पड़ेगा। इसके अलावा उस आदमी ने ने मोनालिसा, द लास्ट सपर जैसी कालजयी पेंटिंग्स की हैं तो क्या हुआ वो आदमी।

‘साइंस और सोशल साइंस’

असल में साइंस और सोशल साइंस अलग चीज़ें हैं ही नहीं। इसे बाइनरी में बनाकर लोगों को सोचने से रोका गया है और कुछ नहीं। दर्शन क्या है। विज्ञान क्या है। सोशल साइंस है क्या। ये हमारे समाज को आसपास को समझने के अलग अलग टूल्स हैं। जो एक अच्छा संगीतज्ञ है वो भी समाज को वैसे ही बेहतरीन ढंग से समझ सकता है जैसे आइंस्टीन समझ सकते हैं। आइंस्टीन, टैगोर और गांधी कई मामलों में एक ही पिच पर थे। जबकि तीनों अलग अलग किस्म के लोग थे।

बड़े लोगों को छोड़ दीजिए। मिनाक्षी (मी) की एक टीचर हैं पैट्रिशिया ओलिनिक है। वो आर्ट विभाग की डायरेक्टर हैं लेकिन वो मेडिकल स्कूल में पढ़ाती हैं आर्ट एंड मेडिकल साइंस। वो एंथ्रोपोलॉजी की क्लासेस भी लेती हैं।

हां एक एंथ्रोपोलॉजी विषय है जिस पर भारत में कुछ होता नहीं। ले देकर एंथ्रोपोलॉजी के नाम पर आदिवासियों के बारे में पढ़ाते हैं जो कि कम से कम एंथ्रोपोलॉजी में ही चालीस साल पुरानी अवधारणा है। उसमें भी अब कई हिस्से हो जाए। कल्चर, मेडिकल, आर्कियोलॉजिकल एंथ्रोपोलॉजी के। एथनोग्राफी अलग ही विधा हो गई है जिसका उपयोग लिटरेचर में भी हो रहा है।

‘दुनिया में ज्ञान खोजिए, ज्ञान को बाइनरी में मत झोंकिये’

हां जॉन नैश को भूल गया उनकी थ्योरी है न गेम थ्योरी है। है तो वो गणित की थ्योरी लेकिन सोशल साइंस में भी उसका इस्तेमाल होता है। मैंने खुद ही गेम थ्योरी पढ़ा है कि कैसे उसे कश्मीर के मामले में लागू किया जा सकता है। इसी उपलब्धि के लिए (ऐसा गणितीय सूत्र जो सोशल साइंस में भी इस्तेमाल हो सकता है) के लिए जॉन नैश को नोबल प्राइज मिला था।

अब आप करते रहिए साइंस और सोशल साइंस। ज्ञान तो ज्ञान है। दर्शन क्या है साइंस या सोशल लाइंस। बर्ट्रैंड रसेल गणितज्ञ थे या फिलॉसफर। हमारे मित्र हैं सुधांशु फिरदौस। हिंदी पट्टी वाले जानते हैं वो कवि हैं लेकिन कम लोग जानते है कि वो गणित में पीएचडी हैं और अच्छे गणितज्ञ हैं।

दुनिया में ज्ञान खोजिए। ज्ञान को बाइनरी में मत झोंकिए। कुछ हासिल नहीं होगा। लेफ्ट राइट मार्क्स और हीगल का रास्ता भी वहीं जाता है जहां इरफान की एक्टिंग का रास्ता जाता है। एक चीज़ पकड़ कर साध लीजिए। वो आपको मुक्ति दे देगा।

(जे. सुशील एक स्वतंत्र शोधार्थी हैं। जेएनयू से पढ़ाई और फिर पत्रकारिता में एक लंबा अनुभव बीबीसी हिन्दी के साथ। वर्तमान में ऑर्टोलाग की मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। आप मिनाक्षी ‘मी’ के साथ कला को लेकर कई सारी सीरीज़ कर चुके हैं। ऑर्टोलाग के यूट्यूब चैनल पर कला की इस यात्रा से रूबरू हो सकते हैं। इस लेख पर अगर आपके सवाल और कोई विचार हैं जो टिप्पणी में जरूर लिखें।

( आप एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब पर जुड़ सकते हैं। रेगुलर अपडेट के लिए हमारे  WhatsApp चैनल को फॉलो करें। आप भी एजुकेशन मिरर के लिए अपनी स्टोरी/लेख/विचार और अनुभव भेज सकते हैं educationmirrors@gmail.com पर।)

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2 Comments
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Durga thakre

बहुत ही रोचक जानकारी से रूबरू कराया हैं सर ।

Kumar Parma

क्या बेहतर लिख रहो हो सर, एक पर एक👍

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