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हम बच्चों को ‘प्राण न्योछावर’ करने के लिए क्यों उकसाते हैं?

education-mirrorहमारी पाठ्यपुस्तकों में ऐसे उदाहरणों की भरमार है जिसमें बच्चों से विभिन्न उद्देश्यों के लिए अपने जान की बाजी लगाने और अपने प्राण न्योछावर करने के लिए कहा जाता है। हैरानी की बात है कि ऐसे उदाहरण प्राथमिक कक्षा में (पहली से पांचवी) पढ़ने वाले बच्चों की किताबों में आ रहे हैं। हम बच्चों से जिंदादिली के साथ जीने की बजाय प्राणों की बाजी लगाने के लिए क्यों कह रहे हैं? इस बात के क्या निहितार्थ हैं?

पाठ्यपुस्तकों की भूमिका

शिक्षा में पाठ्यपुस्तकों की अहम भूमिका होती है। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि किसी व्यक्ति के सोच-विचार को दिशा देने में पाठ्यपुस्तकें अहम भूमिका निभाती हैं। इस विचार के तहत हम चाहते हैं कि बच्चे कुछ चीज़ों के ऊपर आँख मूंदकर भरोसा करें। वे उसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लें। उसके ऊपर कोई सवाल न खड़ा करें। उदाहरण के तौर पर बच्चों की किताब में श्रवण कुमार के ऊपर एक पाठ था। इस पाठ में माता-पिता के लिए जान दे देने की बात कही गई थी।

ज़िंदगी से प्यार है जरूरी

मैंने बच्चों से सवाल किया कि अपने माता-पिता के लिए कौन-कौन जान दे देगा? शुरुआत में क्लास के लगभग हर बच्चे के हाथ ऊपर थे। जब मैंने इस बात पर ज़ोर देकर कहा तो लगभग आधे बच्चों के हाथ नीचे थे। इससे लगा कि उनको जान देने का अर्थ समझ में आ रहा था। इस दौरान विभिन्न मुद्दे सामने आए। अगर श्रवण हमारे दौर में होते तो माता-पिता से शायद बात करते कि आपको घर पर आराम करना चाहिए। आपको चारो धाम की यात्रा पर जाने का विचार अपने मन से निकाल देना चाहिए।

हो सकता है कि उनके माता-पिता श्रवण कुमार की बात मान भी जाते। मगर इस संवाद की गुंजाइश जान देन और प्राण न्योछावर करने वाली बात में कहीं ग़ायब सी हो जाती है। जिसे ज़िंदा रखने की जरूरत है। क्योंकि संवाद के माध्यम से ही बहुत सी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता। बच्चों के लिए कोई पाठ लिखते समय, हम नैतिक शिक्षा देने से खुद को नहीं रोक पाते। हम चाहते हैं कि बच्चे हमारी बातों को ज्यों का त्यों अंतिम सत्य मानकर स्वीकार कर लें। जबकि हमारी असली जिम्मेदारी बच्चे को सवालों का सामना करने के लिए तैयार करना, नये सवाल खड़ा करना और उनका जवाब खोजने की दिशा में प्रयास करना सिखाना है।

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